शोधयात्रा 2025 का समापन और क्षेत्र के विकास के विषयों पर चिंतन
बड़वानी। 25 दिसंबर डोंगरगांव से प्रारंभ हुई शोध यात्रा जिसमें क्षेत्र के उच्चशिक्षित बच्चे,देश के बड़े शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थी-वैज्ञानिक-प्राध्यापक एवं इंजीनियर,डॉक्टर,पशु चिकित्सा वैज्ञानिक, कृषि वैज्ञानिक,प्रबंध संस्थानों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।इसका स्वरूप एक पद यात्रा के रूप में था जिससे ऐसे क्षेत्रों में भी जाया जा सके जहां पर चार पहिया और दो पहिया वाहन भी ना जा सकते हैं और वहां जाकर, वहां रहने वाले आदिवासीयों से मिलकर वहां की जीवन शैली, परंपरा,वास्तविक स्थिति को समझ सके।यात्रा का प्रारंभ ग्राम डोंगरगांव के बापदेव के स्थान पर आदिवासी परंपरा ढास करके बापदेव की बाउंड्री बनाकर, स्थान की साफ-सफाई, मेडिकल कैंप और तीन चेक डैम बनाकर के हुआ। यहां से किराड़ी गांव होते हुए केली में रात्रि विश्राम हुआ। यहां से यात्रा क्रमशः पोखलिया,हाटबाउडी, भानेजकुंड,रामगढ़, मोरानी, गारा,भैसारी,कुंभखेत, गोलपाटीवाडी,कालाखेत, बोकराटा होते हुए पिपरकुंड पहुंची।यात्रा के दौरान क्षेत्र में आदिवासी परंपराओं को समझा, साथ ही बहुत सारी समस्याओं को भी देखा और समझने का प्रयास किया गया। उन विषयों पर विभिन्न विषय विशेषज्ञों जो यात्रा में सम्मिलित हुए थे, ने अपने विचार रखें। आईआईटी दिल्ली से आए डॉक्टर कुलदीप ने बताया कि यहां पर कृषि एवं अन्य कार्यों के लिए टूल्स बहुत कम है और जो टूल्स उपलब्ध है उनकी क्वालिटी भी बिल्कुल अच्छी नहीं है। अभी बहुत सारे नए तरह की धातुओं के टूल्स उपलब्ध हैं जिनमें जंग नहीं लगती,वजन कम होता है और ज्यादा प्राभावीरूप से काम करते हैं। कृषि में टूल्स के साथ ही जो फसल बोई जा रही है और जिस तरह से उनकी देखभाल हो रही है वह तरीका सही नहीं है और कुछ जगह पर जो पारंपरिक तरीके उपयोग किया जा रहे हैं वह बहुत कारगर नहीं दिख रहे। कृषि में जैविक कृषि जो मूल रूप से यहां होती थी उसको बढ़ावा उसकी ट्रेनिंग देने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य विषय को लेकर यह देखने में आया की महिलाओं में स्वास्थ्य की बहुत सारी समस्याएं हैं।अधिकांश महिलाएं सामान्य पोषण से काम है। बारिश की ऋतु छोड़कर के बाकी समय सब्जियों का उपयोग कम होता है जिससे पोषण सही नहीं मिल पाता। महिलाओं के स्वास्थ्य के कारण से बच्चों का स्वास्थ्य और पूरे परिवार का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है।जीवन यापन के लिए बढ़ती जनसंख्या के कारण जमीन की कमी देखने में आ रही है और उसके कारण जंगल पहाड़ की जमीनों को खोदकर खेत बना रहे हैं।जो यहां सामान्यतः उगते हैं जैसे कपास और जंगल के पेड़ इनको लेकर के कौशल विकास के कार्य हो तो जीवन यापन के लिए रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं। कपास के वैल्यू एडिशन से और इस संबंध में कौशल विकास से बहुत सारे किसानों की अच्छी आय हो सकती है।जैविक खेती को बढ़ावा देने से जमीन और उसके पोषक तत्वों के साथ जैव विविधता को भी बढ़ाया जा सकता है जिससे समग्र रूप में फसल और किसान की आय बढ़ सकती है।
बड़वानी/संजय बामनिया की रिपोर्ट

